Indian Women and Invisible Burden जो कोई नहीं देखता

 

Indian Women and Invisible Burdenजो कोई नहीं देखता



भारतीय महिलाओं की ज़िंदगी बाहर से देखने पर अक्सर व्यवस्थित और संतुलित लगती है। वह घर संभाल रही है, रिश्ते निभा रही है, काम कर रही है और फिर भी मुस्कुरा रही है। लेकिन इस मुस्कान के पीछे एक ऐसा बोझ छुपा होता है जिसे न तो समाज गिनता है, न ही अक्सर परिवार पहचान पाता है। इसे कहा जा सकता है Invisible Burden—एक अदृश्य ज़िम्मेदारी, जो चुपचाप महिलाओं के कंधों पर डाल दी जाती है। यह ब्लॉग उसी अनदेखे बोझ की परतें खोलने की कोशिश है।


Invisible Burden क्या होता है?

Invisible burden उन ज़िम्मेदारियों को कहते हैं जो लिखी नहीं होतीं, लेकिन निभाना अनिवार्य समझी जाती हैं। जैसे:

  • घर के हर सदस्य की भावनाओं को समझन,सबकी ज़रूरतों को याद रखना

  • रिश्तों में संतुलन बनाए रखना, घर का emotional environment संभालना

यह काम दिखता नहीं, इसलिए इसकी क़द्र भी नहीं होती। लेकिन मानसिक रूप से यह सबसे थकाने वाला बोझ होता है।


 Emotional Labour  घर की अदृश्य नौकरी

भारतीय महिला अक्सर घर की emotional manager होती है।

  • कौन नाराज़ है? किसे कैसे मनाना है?

  • किस बात पर चुप रहना है? किस समय क्या बोलना है?

यह सब सोचते-सोचते महिला खुद को भूल जाती है। Emotional labour को कभी काम नहीं माना जाता, जबकि यह लगातार ऊर्जा खाता है।


“सब संभालने वाली” महिला का मिथक

समाज ने महिला की एक छवि बना दी है

"वह सब संभाल लेती है।"

लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि  क्या वह थकती नहीं? क्या उसे सहारे की ज़रूरत नहीं?

क्या उसे टूटने की इजाज़त है?

इस मिथक के कारण महिला अपनी थकान को भी अपराधबोध की तरह महसूस करने लगती है।


 Guilt Invisible Burden का सबसे भारी हिस्सा

भारतीय महिलाओं में guilt बहुत गहराई से बैठा होता है।

अपने लिए समय निकालने पर guilt ,आराम करने पर guilt, “ना” कहने पर guilt

यह guilt पीढ़ियों से सिखाया गया है कि अच्छी महिला वही है जो खुद को आख़िर में रखे।


 Mental Load जो कभी खत्म नहीं होता

घर की planning, बच्चों का भविष्य, बुज़ुर्गों की सेहत, रिश्तों की राजनीति—सब महिला के दिमाग़ में चलता रहता है।

यह mental load रात में overthinking बनकर निकलता है। नींद नहीं आती, मन बेचैन रहता है, लेकिन बाहर से सब normal दिखता है।


 Working Women और Double Burden

कामकाजी महिलाएँ दोहरी ज़िम्मेदारी उठाती हैं।

ऑफिस में professional role ,घर में traditional expectations

काम के बाद भी महिला की duty खत्म नहीं होती। उसकी थकान को luxury माना जाता है, ज़रूरत नहीं।


“Strong Woman” टैग का दबाव

महिलाओं को strong कहकर उनकी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

“तुम तो strong हो, संभाल लोगी।”

यह वाक्य सहारे जैसा लगता है, लेकिन असल में यह एक भावनात्मक अकेलापन पैदा करता है।


 Invisible Burden और रिश्ते

अक्सर रिश्तों में महिला giver बन जाती है और धीरे-धीरे receiver बनना भूल जाती है। जब वह शिकायत करती है, तो कहा जाता है

“इतना सोचने की क्या ज़रूरत है?”

उसकी emotional needs को drama समझ लिया जाता है।


इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर

Invisible burden का सीधा असर mental health पर पड़ता है:

  • Anxiety

  • Depression

  • Emotional numbness

  • Burnout

लेकिन महिलाएँ मदद मांगने से पहले सौ बार सोचती हैं।


 चुप्पी क्यों चुनती हैं महिलाएँ?

क्योंकि

उन्हें “complainer” कहलाने का डर होता है, रिश्ते टूटने का डर ,guilt का डर

चुप रहना आसान लगता है, लेकिन यह अंदर ही अंदर तोड़ देता है।


बदलाव की शुरुआत कहाँ से हो?

Emotional labour को पहचान देना

महिलाओं को “ना” कहने की अनुमति

जिम्मेदारियों का समान बँटवारा

मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत

Invisible burden तब हल्का होगा, जब उसे देखा जाएगा।


भारतीय महिलाएँ कमज़ोर नहीं हैं, वे बस थकी हुई हैं। Invisible burden उनकी क्षमता नहीं, बल्कि समाज की सुविधा है। अब समय है कि इस बोझ को देखा जाए, समझा जाए और साझा किया जाए।

अगर आप एक महिला हैं और यह पढ़ते हुए खुद को महसूस कर रही हैं—तो जान लीजिए, आप अकेली नहीं हैं। और अगर आप इसे समझ पा रहे हैं—तो यही बदलाव की शुरुआत है।चैनल को लाइक करें और कमेंट में ज़रूर बताएं कि आपको यह ब्लॉग कैसा लगा। आपकी प्रतिक्रिया ही मेरी सबसे बड़ी मोटिवेशन है, जिससे मुझे इसी तरह और लिखने की प्रेरणा मिलती है। चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें और कमेंट सेक्शन में अपने विचार ज़रूर साझा करें


हिमानी भारद्वाज


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