Indian Womenजब सबका ख्याल रखते-रखते खुद को खो देती हैं


Indian Women and Emotional Burnout जब सबका ख्याल रखते-रखते खुद को खो देती हैं

“थकान जो नींद से नहीं जाती”

बहुत-सी भारतीय महिलाएँ जब अपनी हालत बयान करती हैं तो बस इतना कहती हैं—
“थोड़ा थक गई हूँ।”

लेकिन यह थकान साधारण नहीं होती।
यह वह थकान होती है जो आराम करने से भी नहीं जाती,
जो मुस्कान के पीछे छिपी रहती है,
और जो धीरे-धीरे मन, शरीर और रिश्तों को खोखला कर देती है।

घर, परिवार, बच्चे, पति, ससुराल, नौकरी, रिश्ते, समाज  हर जगह निभाने की कोशिश में
भारतीय महिला अक्सर खुद से ही रिश्ता तोड़ बैठती है।

यही स्थिति कहलाती है Emotional Burnout

यह कमजोरी नहीं है,
यह लगातार अनदेखा किए गए भावनात्मक बोझ का परिणाम है।


Emotional Burnout क्या होता है?

Emotional burnout तब होता है जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक

  • दूसरों की ज़रूरतें अपनी ज़रूरतों से ऊपर रखता है

  • बिना appreciation के देता रहता है

  • अपने emotions को दबाता रहता है और “मुझे strong रहना है” की भूमिका निभाता रहता है

धीरे-धीरे ऐसा व्यक्ति emotionally empty महसूस करने लगता है ,किसी चीज़ में खुशी नहीं मिलती ,खुद को पहचानना मुश्किल हो जाता है

Burnout अचानक नहीं होता।
यह हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके बनता है।


Indian Women में Emotional Burnout ज़्यादा क्यों होता है?

भारतीय समाज में महिलाओं को बचपन से सिखाया जाता है

Adjust करना ही समझदारी है, सहन करना ही ताक़त है, खुद की जरूरतों को पीछे रखना ही अच्छाई है

Multiple Roles का दबाव एक ही महिला से उम्मीद की जाती है कि वह

आदर्श बेटी हो, समझदार बहू हो, त्यागी पत्नी हो ,perfect माँ हो, और सफल प्रोफेशनल भी

लेकिन सवाल यह है
उसके लिए कौन होता है?


Emotional Labor का बोझ महिलाएँ सिर्फ काम नहीं करतीं, वे emotions भी संभालती हैं

सब खुश हैं या नहीं, घर का माहौल ठीक है या नहीं, किसी को बुरा तो नहीं लगा, रिश्ते टूट न जाएँ

यह invisible emotional work  कभी acknowledge नहीं किया जाता।


 Boundaries को “Selfish” समझा जाना अगर कोई महिला कहे—

“मुझे आराम चाहिए”

“मुझे अकेला समय चाहिए”

“मैं यह नहीं कर पाऊँगी”

तो अक्सर उसे कहा जाता हैं “इतना क्या सोचती हो?”

“घर की औरत होकर इतना drama?”

इस guilt की वजह से महिलाएँ अपनी limits को ही ignore करने लगती हैं।


Burnout के Hidden Signs जो दिखते नहीं, पर अंदर बहुत कुछ तोड़ते हैं

Emotional burnout हमेशा साफ-साफ नज़र नहीं आता।

कुछ common लेकिन unnoticed संकेत छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, बिना वजह रोने का मन, खुशी महसूस करने पर guilt, लोगों से दूरी बनाने की इच्छा, हर समय tired feeling, “मुझे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा”

कई महिलाएँ कहती हैं

“सब ठीक है, बस मैं जैसी पहले थी वैसी नहीं रही।”

यही burnout की आवाज़ होती है।


शरीर कैसे इस emotional बोझ को ढोता है?

मन और शरीर अलग-अलग नहीं होते।
जो भावना शब्दों में नहीं निकल पाती,
वह शरीर के ज़रिए बाहर आती है।

Burnout से जुड़ी शारीरिक समस्याएँ

  • लगातार थकान

  • सिर दर्द, माइग्रेन

  • पेट से जुड़ी समस्याएँ

  • हार्मोनल imbalance

  • नींद न आना

  • anxiety और panic attacks

कई बार डॉक्टर कहते हैं “Reports तो normal हैं।”

लेकिन दर्द real होता है, क्योंकि समस्या emotional होती है।


समाज की सबसे बड़ी गलतफहमी  “सब manage कर लेना ही strength है”

भारतीय समाज में strong woman की परिभाषा जो रोए नहीं, जो शिकायत न करे, जो सब कुछ सह ले

लेकिन मनोविज्ञान कहता है

❌ यह strength नहीं
❌ यह emotional suppression है

और suppressed emotions
कभी न कभी burnout बन जाते हैं।


Emotional Burnout और रिश्ते Burnout का असर सिर्फ महिला पर नहीं,

उसके रिश्तों पर भी पड़ता है।

  • पति से emotional दूरी, बच्चों पर गुस्सा, खुद से नफरत, intimacy की कमी

अक्सर महिलाएँ खुद को दोष देती हैं
“मैं अच्छी पत्नी/माँ नहीं हूँ।”

जबकि सच्चाई यह है
कोई भी इंसान खाली होकर किसी को भर नहीं सकता।


Healing की शुरुआत कहाँ से होती है?

Healing कोई बड़ा कदम नहीं,
यह छोटे-छोटे emotional shifts से शुरू होती है।

 “ना” कहना सीखना

हर जगह उपलब्ध रहना ज़रूरी नहीं।
ना कहना असम्मान नहीं,
self-respect है।

Guilt के बिना Rest

आराम कोई इनाम नहीं है,
यह ज़रूरत है।

अपनी भावनाओं को नाम देना

“ठीक नहीं लग रहा”
भी एक valid feeling है।

Support माँगना

Strong होने का मतलब
अकेले सब संभालना नहीं होता।

 Counseling को Normalize करना

Counseling पागलों के लिए नहीं,
थके हुए लोगों के लिए होती है।


Counselor’s Note

(Professional Perspective)

एक counselor के रूप में
अक्सर देखा जाता है कि महिलाएँ
तब help लेने आती हैं जब

  • शरीर जवाब देने लगता है

  • रिश्ते टूटने लगते हैं

  • anxiety uncontrollable हो जाती है

अगर शुरुआत में ही emotions को सुना जाए,
तो burnout को रोका जा सकता है।

Mental health care luxury नहीं, necessity है।


खुद को बचाना स्वार्थ नहीं है

अगर एक महिला emotionally healthy नहीं होगी
तो पूरा परिवार imbalance में रहेगा।

आप सिर्फ सबकी caretaker नहीं हैं—
आप भी care की हकदार हैं।

आपका दर्द real है।
आपकी थकान valid है।
और आपकी healing possible है।

“खुद को चुनना, दूसरों को छोड़ना नहीं है”

Emotional burnout
आपकी नाकामी की कहानी नहीं है,
यह उस सिस्टम की कहानी है
जिसने आपको थकने की इजाज़त नहीं दी।

अब समय है—

  • खुद को सुनने का

  • खुद को समझने का

  • और खुद के लिए खड़े होने का

क्योंकि जब आप ठीक होंगी, तभी बाकी सब ठीक होगा।


हिमानी भारद्वाज

अगर इस ब्लॉग की बातें आपको कहीं न कहीं छू गई हों,
अगर आपको लगा हो कि यह आपकी ही कहानी है —
तो याद रखिए, आपको इसे अकेले संभालने की ज़रूरत नहीं है।

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